यह महाकाव्य उस क्षण से जन्मा है, जब एक मनुष्य ने अपने भीतर के अनंत अंधकार में आँख खोली। जब चारों ओर केवल सन्नाटा था, जब भीतर और बाहर केवल निराशा थी, जब शब्द भी साथ छोड़ चुके थे, और सपने भी पलायन कर गए थे— तब भी एक छोटी सी चिंगारी बची थी। उसी चिंगारी से यह महाग्रंथ प्रज्वलित हुआ।
'तिमिर का छोर' केवल एक भौतिक अंधकार का अंत नहीं है। यह मानव-चेतना की वह महायात्रा है, जहाँ आत्मा अपने भीतर के द्वंद्वों से, सामाजिक रूढ़ियों की जंजीरों से, निराशा के गहरे कुओं से, और अज्ञात के असीम भय से लड़ते हुए— पूर्ण प्रकाश की ओर, ज्ञान और आत्म-साक्षात्कार की ओर बढ़ती है।
इस महाकाव्य को पंद्रहसर्गों में विभाजित किया गया है। हर सर्ग एक पड़ाव है, हर छंद एक सीढ़ी है, और हर शब्द उस महायात्री का पाथेय है, जो तिमिर के छोर को खोजने निकला है।